कबीर साहेब प्रकट दिवस

भारत देश (जम्बू द्वीप) के काशी नगर (बनारस) में नीरु-नीमा नाम के पति-पत्नी थे।
वे मुसलमान जुलाहा थे। वे निःसंतान थे। ज्येष्ठ सुदी पूर्णमासी की सुबह (ब्रह्म मुहूर्त में)
लहरतारा नामक सरोवर में काशी के बाहर जंगल में मैं नवजात शिशु का रुप धारण करके
कमल के फूल पर लेटा था। मैं अपने इसी स्थान से गति करके गया था। नीरु जुलाहा तथा
उसकी पत्नी प्रतिदिन उसी तालाब पर स्नानार्थ जाया करते थे। उस दिन मुझे बालक रुप
में प्राप्त करके अत्यन्त खुश हुए। मुझे अपने घर ले गए। मैंने 25 दिन तक कुछ भी आहार
नहीं किया था। तब शिवजी एक साधु के वेश में उनके घर गए। वह सब मेरी प्रेरणा ही थी।
शिव से मैंने कहा था कि मैं कंवारी गाय का दूध पीता हूँ। तब नीरु एक बछिया लाया। शिव
को मैंने शक्ति प्रदान की, उन्होंने बछिया की कमर पर अपना आशीर्वाद भरा हाथ रखा।
कंवारी गाय ने दूध दिया। तब मैंने दूध पीया था। मैं प्रत्येक युग में ऐसी लीला करता हूँ।
जब मैं शिशु रुप में प्रकट होता हूँ, तब कंवारी गायों से मेरी परवरिश की लीला हुआ करती
है। हे गरीब दास! चारों वेद मेरी महिमा का गुणगान करते हैं।

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